Chapter 1 · अर्जुनविषादयोग
Bhagavad Gita 1.36
मूल श्लोक :
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे जनार्दन इन धृतराष्ट्रसम्बन्धियोंको मारकर हमलोगोंको क्या प्रसन्नता होगी इन आततायियोंको मारनेसे तो हमें पाप ही लगेगा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अर्जुन के इतना कुछ कहने पर भी भगवान् श्रीकृष्ण मूर्तिवत् मौन ही रहते हैं। इसलिये वह पहले की भाषा छोड़कर मृदुभाव से किसी मन्द बुद्धि मित्र को कोई बात समझाने की शैली में भावुक तर्क देने लगता है। भगवान् के निरन्तर मौन धारण किये रहने से अर्जुन की यह परिवर्तित नीति अत्यन्त हास्यास्पद प्रतीत होती है।इस श्लोक में प्रथम वह कहता है कि दुर्योधनादि को मारने से किसी प्रकार का कल्याण होने वाला नहीं है। इस पर भी काष्ठवत् मौन खड़े श्रीकृष्ण को देखकर उसको इस मौन भाव का कारण समझ में नहीं आता। शीघ्र ही उसे स्मरण हो आता है कि कौरव परिवार आततायी है और धर्मशास्त्र के नियमानुसार आततायी को तत्काल मार डालना चाहिये चाहे वह शिक्षक वृद्ध पुरुष या वेदज्ञ ब्राह्मण ही क्यों न हो। आततायी को मारने में किसी प्रकार का पाप नहीं है। अन्यायपूर्वक किसी पर आक्रमण करने वाला पुरुष आततायी कहलाता है।अपने शुद्ध दिव्य स्वरूप के विपरीत हम जो गलत काम करते हैं वे पाप कहलाते हैं। शरीर मन और बुद्धि को ही अपना स्वरूप समझकर कोई कर्म करना श्रेष्ठ मनुष्य का लक्षण नहीं है। अहंकारपूर्वक स्वार्थ के लिये किये गये कर्म हमारे और शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा के बीच वासना की सुदृढ़ दीवार खड़ी कर देते हैं। इन्हें ही पाप कहा जाता है।शत्रुओं की हत्या करने में अर्जुन का अविवेकपूर्ण विरोध शास्त्र को न समझने का परिणाम है और फिर अपनी समझ के अनुसार कर्म करना अपनी संस्कृति को ही नष्ट करना है।इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के तर्कों की न स्तुति करते हैं और न ही आलोचना। वे जानते हैं कि अर्जुन को अपने मन की बात कह लेने देनी चाहिए। किसी मानसिक रोगी के लिए यह उत्तम निदान है। इस प्रकार उसका चित्त शांत हो जाता है।
English Translation By Swami Sivananda
By killing these sons of Dhritarashtra, what pleasure can
be ours, O Janardana? Only sin will accrue to us from killing these felons.
Transliteration
nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana
pāpamevāśrayedasmānhatvaitānātatāyinaḥअनुवाद
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारने से हमें पाप ही लगेगा।
भावार्थ
अर्जुन श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी नैतिक दुविधा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि अपने ही स्वजनों को मारने से उन्हें कोई सुख नहीं मिलेगा। यद्यपि कौरव ‘आततायी’ (आग लगाने वाले, विष देने वाले आदि) हैं और शास्त्रानुसार वध के योग्य हैं, फिर भी अर्जुन मानते हैं कि उन्हें मारने से केवल पाप ही लगेगा। वे ऐसे रक्तपात से प्राप्त होने वाली विजय को निरर्थक मानते हैं।
Translation
O Janardana, what pleasure would be ours by killing the sons of Dhritarashtra? Sin alone would take hold of us by killing these aggressors.
Meaning
Arjuna continues to express his deep moral dilemma to Krishna. Even though the Kauravas are considered ‘ātatāyinaḥ’ (aggressors who deserve death according to scriptures for crimes like poisoning and arson), Arjuna feels that killing his own relatives will only bring sin. He questions the ultimate value of a victory gained through such bloodshed.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| निहत्य | मारकर |
| धार्तराष्ट्रान् | धृतराष्ट्र के पुत्रों को |
| नः | हमें |
| का | क्या |
| प्रीतिः | प्रसन्नता |
| स्यात् | होगी |
| जनार्दन | हे जनार्दन |
| पापम् | पाप |
| एव | ही |
| आश्रयेत् | लगेगा |
| अस्मान् | हमें |
| हत्वा | मारकर |
| एतान् | इन |
| आततायिनः | आततायियों को |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| nihatya | having killed |
| dhārtarāṣṭrān | the sons of Dhritarashtra |
| naḥ | to us |
| kā | what |
| prītiḥ | pleasure |
| syāt | would be |
| janārdana | O Janardana |
| pāpam | sin |
| eva | only |
| āśrayet | would take hold of |
| asmān | us |
| hatvā | by killing |
| etān | these |
| ātatāyinaḥ | aggressors |