श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 1 · अर्जुनविषादयोग

Bhagavad Gita 1.35

मूल श्लोक :

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते।।1.35।।

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

।।1.34  1.35।।(टिप्पणी प0 24.1) आचार्य? पिता? पुत्र और उसी प्रकार पितामह? मामा? ससुर? पौत्र? साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं? मुझपर प्रहार करनेपर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता? और हे मधुसूदन मुझे त्रिलोकीका राज्य मिलता हो? तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता? फिर पृथ्वीके लिये तो मैं इनको मारूँ ही क्या

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

।।1.35।। यह विचार कर कि संभवत उसने अपने पक्ष को श्रीकृष्ण के समक्ष अच्छी प्रकार दृढ़ता से प्रस्तुत नहीं किया है जिससे कि भगवान् उसके मत की पुष्टि करें अर्जुन व्यर्थ में त्याग की बातें करता है। वह यह दर्शाना चाहता है कि वह इतना उदार हृदय है कि उसके चचेरे भाई उसको मार भी डालें तो भी वह उन्हें मारने को तैयार नहीं होगा। अतिशयोक्ति की चरम सीमा पर वह तब पहुँचता है जब वह घोषणा करता है कि त्रैलोक्य का राज्य मिलता हो तब भी वह युद्ध नहीं करेगा फिर केवल हस्तिनापुर के राज्य की बात ही क्या है।

English Translation By Swami Sivananda

1.35. These I do not wish to kill, though they kill me, O Krishna,
even for the sake of dominion over the three worlds; leave alone killing
them for the sake of the earth.