Chapter 1 · अर्जुनविषादयोग
Bhagavad Gita 1.32
मूल श्लोक :
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वाHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे कृष्ण मैं न तो विजय चाहता हूँ? न राज्य चाहता हूँ और न सुखोंको ही चाहता हूँ। हे गोविन्द हमलोगोंको राज्यसे क्या लाभ भोगोंसे क्या लाभ अथवा जीनसे भी क्या लाभ
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
बुद्धि से पूर्णतया विलग होकर उसका भ्रमित मन एक पागल के समान इधरउधर दौड़ता है और मूर्खतापूर्ण निष्कर्षों पर पहुँचता है। वह कहता है मैं न विजय चाहता हूँ न राज्य और न सुख। यह सुविदित तथ्य है कि यदि उन्माद (हिस्टीरिया) के रोगी को बोलने दिया जाय तो वह निषेध भाषा में ही रोग का कारण बताने लगता है। उदाहरणार्थ किसी स्त्री पर उन्माद का दौरा पड़ने पर वह प्रलाप में कहती है कि वह अपने पति से अभी भी प्रेम करती है पति का वह आदर करती है और उनमें कोई आपसी मतभेद नहीं है इत्यादि तो इन वाक्यों द्वारा वह स्वयं ही अपने रोग का वास्तविक कारण बता रही होती है।इसी प्रकार अर्जुन यह जो सब वस्तुओं की अनिच्छा प्रकट कर रहा है उसी से हम उसकी मनस्थिति का स्पष्ट कारण जान सकते हैं कि वह विजय चाहता था। वह शीघ्र ही अपने एवं स्वजनों के लिये राज्य व सुख प्राप्त करने के लिये आतुर था। परन्तु कौरवों की विशाल सेना और उनमें जानेमाने शूर वीर योद्धाओं को देखकर उसकी आशा भंग हो गयी महत्त्वाकांक्षा ध्वस्त हो गयी और वह आत्मविश्वास भी खोने लगा। इस प्रकार वह धीरेधीरे अर्जुनरोग रूपी विषाद की स्थिति में पहुँच गया जिसके निवारण का विषय ही गीता का प्रतिपाद्य विषय है।
English Translation By Swami Sivananda
I desire not victory, O Krishna, nor kingdom, nor pleasures.
Of what avail is dominion to us, O Krishna, or pleasures or even life?
Transliteration
na kāṅkṣe vijayaṃ kṛṣṇa na ca rājyaṃ sukhāni ca
kiṃ no rājyena govinda kiṃ bhogairjīvitena vāअनुवाद
हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ, और न ही राज्य तथा सुखों को। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन, अथवा भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ?
भावार्थ
अर्जुन युद्ध के परिणामों से अत्यंत विचलित हो जाते हैं और अपने स्वजनों को मारने के विचार से कांप उठते हैं। वह भगवान कृष्ण से कहते हैं कि उन्हें ऐसा राज्य, सुख या विजय नहीं चाहिए जो अपने ही गुरुजनों और संबंधियों के रक्त से सना हो।
Translation
O Krishna, I do not desire victory, nor kingdom, nor pleasures. O Govinda, of what use is kingdom to us, or pleasures, or even life?
Meaning
Arjuna becomes deeply disturbed by the potential consequences of the war and shudders at the thought of killing his own kinsmen. He expresses to Lord Krishna that he has no desire for a kingdom, happiness, or victory that comes at the cost of the lives of his relatives and teachers.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| काङ्क्षे | चाहता हूँ |
| विजयम् | विजय |
| कृष्ण | हे कृष्ण |
| न | न |
| च | और |
| राज्यम् | राज्य |
| सुखानि | सुखों को |
| च | तथा |
| किम् | क्या प्रयोजन |
| नः | हमें |
| राज्येन | राज्य से |
| गोविन्द | हे गोविन्द |
| किम् | क्या लाभ |
| भोगैः | भोगों से |
| जीवितेन | जीवन से |
| वा | अथवा |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| kāṅkṣe | do I desire |
| vijayam | victory |
| kṛṣṇa | O Krishna |
| na | nor |
| ca | and |
| rājyam | kingdom |
| sukhāni | pleasures |
| ca | also |
| kim | what use |
| naḥ | to us |
| rājyena | with kingdom |
| govinda | O Govinda |
| kim | what |
| bhogaiḥ | with pleasures |
| jīvitena | with life |
| vā | or |