Chapter 1 · अर्जुनविषादयोग
Bhagavad Gita 1.27
मूल श्लोक :
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
अपनीअपनी जगहपर स्थित उन सम्पूर्ण बान्धवोंको देखकर वे कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त कायरतासे युक्त होकर विषाद करते हुए ये वचन बोले।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा सेना के दिखाये जाने पर अर्जुन ने शत्रुपक्ष में खड़े अपने सगेसम्बन्धियों को देखा परिवार के ही प्रिय सदस्यों को पहचाना जिनमें भाईभतीजे गुरुजन पितामह और अन्य सभी परिचित एवं सुहृद जन थे। शत्रुपक्ष में ही नहीं वरन् उसने अपनी सेना में भी इसी प्रकार सुपरचित और घनिष्ठ संबंधियों को देखा। संभवत इस दृश्य को देखकर पहली बार एक पारिवारिक कलह के भयंकर दुखदायी परिणाम का अनुमान वह कर सका जिससे उसका अन्तरतम तक हिल गया। एक कर्मशील योद्धा होने के कारण संभवत अब तक उसने यह सोचा भी नहीं था कि अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरी करने और दुर्योधन के अन्यायों का बदला लेने में सम्पूर्ण समाज को किस सीमा तक अपना बलिदान देना होगा।कारण जो कुछ भी रहा हो लेकिन यह स्पष्ट है कि इस दृश्य को देखकर उसका हृदय करुणा और विषाद से भर गया। परन्तु इस समय की उसकी करुणा स्वाभाविक नहीं थी। यदि उसमें करुणा और विषाद की भावनायें गौतम बुद्ध के समान वास्तविक और स्वाभाविक होतीं तो युद्ध के बहुत पूर्व ही वह भिन्न प्रकार का व्यवहार करता। संजय का अर्जुन की इस भावना को करुणा नाम देना उपयुक्त नहीं है। साधारणत मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह अपनी दुर्बलताओं को कोई दैवी गुण बताकर महानता प्राप्त करना चाहता है जैसे कोई धनी व्यक्ति स्वयं के नाम पर मन्दिर निर्माण करता है तोे भी उसको दानी कहते हैं जबकि उसके मन में अपना नाम अमर करने की प्रच्छन्न इच्छा होती है। इसी प्रकार यहाँ भी अर्जुन के मन में विषाद की भावना का उदय उसके मनसंयम के पूर्णतया बिखर जाने के कारण हुआ जिसका गलती से करुणा नाम दिया गया।अर्जुन के मन में असंख्य दमित भावनाओं का एक लम्बा सिलसिला था जो सक्रिय रूप से शक्तिशाली बनकर व्यक्त होने के लिये अवसर की खोज कर रहा था। इस समय अर्जुन के मन तथा बुद्धि परस्पर वियुक्त हो चुके थे क्योंकि स्वयं को सर्वश्रेष्ठ वीर समझने के कारण उसके मन में युद्ध में विजयी होने की प्रबल आतुरता थी। पूर्व की दमित भावनायें और वर्तमान की विजय की व्याकुलता के कारण उसकी विवेक बुद्धि विचलित हो गयी।इस अध्याय में आगे वर्णन है कि अर्जुन एक असंतुलित मानसिक रोगी के समान व्यवहार करने लगता है। गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुनरोग से पीड़ित व्यक्ति के रोग का इतिहास बताने का प्रयत्न किया गया है। जैसा कि मैंने पहले कहा है इस आत्मघातक अर्जुनरोग का रामबाण उपाय श्रीकृष्णोपचार है।
English Translation By Swami Sivananda
(He saw) fathers-in-law and friends also in both the armies.
The son of Kunti, Arjuna, seeing all those kinsmen thus standing arrayed,
spoke this, sorrowfully filled with deep pity.
Transliteration
śvaśurān suhṛdaś caiva senayor ubhayor api
tān samīkṣya sa kaunteyaḥ sarvān bandhūn avasthitānअनुवाद
उन कुन्तीपुत्र (अर्जुन) ने दोनों सेनाओं में ससुरों और मित्रों को तथा वहां उपस्थित उन सभी बन्धु-बान्धवों को देखकर…
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में अपने सगे-संबंधियों को देखने का वर्णन जारी है। वह दोनों पक्षों की सेनाओं में अपने ससुरों, मित्रों और अन्य सभी पारिवारिक सदस्यों को युद्ध के लिए तैयार खड़े देखते हैं। अपने ही प्रियजनों को इस प्रकार मृत्यु के मुख में खड़ा देखकर अर्जुन के मन में गहरी करुणा और विषाद उत्पन्न होने लगता है।
Translation
He, the son of Kunti, having seen fathers-in-law and well-wishers in both the armies, and having observed all those relatives present there…
Meaning
This verse continues the description of Arjuna observing his relatives on the battlefield of Kurukshetra. He sees his fathers-in-law, well-wishers, and all other family members stationed in the armies of both sides. Witnessing his own loved ones prepared for a deadly war sets the stage for the deep compassion and sorrow that soon overwhelms him.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्वशुरान् | ससुरों को |
| सुहृदः | मित्रों को |
| च | और |
| एव | भी |
| सेनयोः | सेनाओं में |
| उभयोः | दोनों |
| अपि | भी |
| तान् | उन |
| समीक्ष्य | देखकर |
| सः | वह |
| कौन्तेयः | कुन्तीपुत्र (अर्जुन) |
| सर्वान् | सभी |
| बन्धून् | बन्धु-बान्धवों को |
| अवस्थितान् | उपस्थित |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śvaśurān | fathers-in-law |
| suhṛdaḥ | well-wishers |
| ca | and |
| eva | also |
| senayoḥ | in the armies |
| ubhayoḥ | in both |
| api | also |
| tān | them |
| samīkṣya | having seen |
| saḥ | he |
| kaunteyaḥ | son of Kunti (Arjuna) |
| sarvān | all |
| bandhūn | relatives |
| avasthitān | situated |