श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 1 · अर्जुनविषादयोग

Bhagavad Gita 1.20

मूल श्लोक :

अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे महीपते धृतराष्ट्र अब शस्त्रोंके चलनेकी तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्यको धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियोंको व्यवस्थितरूपसे सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुनने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णसे ये वचन बोले।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इन डेढ़ श्लोकों में महाभारत युद्ध के नायक अर्जुन का युद्धक्षेत्र में प्रवेशवर्णन मिलता है। उसके प्रवेश का ठीक समय और ढंग भी इसमें अंकित किया गया है। अभी बाण युद्ध प्रारम्भ नहीं हुआ था किन्तु वह क्षण दूर भी नहीं था। युद्ध का वह सर्वाधिक तनावपूर्ण क्षण था। संकट अपने चरम बिन्दु पर पहुँच गया था। ऐसे समय कपिध्वज अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से अपने रथ को उभय पक्ष के मध्य ले चलने का अनुरोध किया।प्राचीनकाल में युद्धभूमि पर प्रत्येक श्रेष्ठ योद्धा का अपना एक विशेष सुप्रसिद्ध चिह्नांकित ध्वज होता था। पताका को पहराते समय रथ में बैठेे रथी को शत्रु की पहचान होती थी। उस समय के नियमानुसार एक साधारण सैनिक सेनानायक पर बाण नहीं चला सकता था। प्रत्येक योद्धा अपने समकक्ष योद्धा के साथ ही युद्ध करता था। विशिष्ट चिह्न द्वारा किसी व्यक्ति को पहचानने की प्रथा आज भी युद्ध क्षेत्र में प्रचलित है। किसी उच्च अधिकारी के वाहन और गणवेश पर उसके परिचायक विशेष चिह्न अंकित होते हैं। अर्जुन के ध्वज का प्रतीक चिह्न कपि था।संजय द्वारा किये गये वर्णन से प्रतीत होता है कि अर्जुन धर्मयुद्ध को प्रारम्भ करने के लिये अधीर हो रहा था। उसने अपना धनुष उठा लिया था जिससे उसकी युद्धतत्परता का संकेत मिलता है।

English Translation By Swami Sivananda

Then, seeing the people of Dhritarashtra’s party standing
arrayed and the discharge of weapons about to begin, Arjuna, the son of
Pandu, whose ensign was a monkey, took up his bow and said the following
to Krishna, O Lord of the earth.

Transliteration

atha vyavasthitān dṛṣṭvā dhārtarāṣṭrānkapidhvajaḥ
pravṛtte śastrasaṃpāte dhanurudyamya pāṇḍavaḥ

अनुवाद

इसके बाद, जब शस्त्रों का प्रहार शुरू होने ही वाला था, तब हनुमान के चिह्न वाली ध्वजा वाले पाण्डु पुत्र (अर्जुन) ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को मोर्चे पर व्यवस्थित देखकर अपना धनुष उठा लिया।

भावार्थ

यह श्लोक युद्ध शुरू होने से ठीक पहले के अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण का वर्णन करता है। कपिध्वज (हनुमान जी के चिह्न वाली ध्वजा) वाले रथ पर विराजमान अर्जुन कौरव सेना को युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार देखते हैं। वे अपना धनुष गांडीव उठाते हैं, जो उनके युद्ध के लिए सन्नद्ध होने का संकेत है, और इसके तुरंत बाद वे श्रीकृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाने का अनुरोध करते हैं।

Translation

Then, seeing the sons of Dhritarashtra arrayed, as the clash of weapons was about to begin, the son of Pandu (Arjuna), whose banner bears the emblem of Hanuman, took up his bow.

Meaning

This verse marks the critical moment just before the great war commences. Arjuna, seated on his chariot with Hanuman on his flag, observes the Kaurava army fully prepared for battle. He raises his bow, Gandiva, signaling his readiness to fight, which immediately precedes his request to Krishna to move the chariot between the two armies.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अथइसके बाद
व्यवस्थितान्व्यवस्थित (खड़े हुए)
दृष्ट्वादेखकर
धार्तराष्ट्रान्धृतराष्ट्र के पुत्रों को
कपिध्वजःहनुमान के चिह्न वाली ध्वजा वाले
प्रवृत्तेशुरू होने ही वाले
शस्त्रसंपातेशस्त्रों के प्रहार (के समय)
धनुःधनुष को
उद्यम्यउठाकर
पाण्डवःपाण्डु पुत्र (अर्जुन)

Word by word

WordMeaning
athathen
vyavasthitānarrayed
dṛṣṭvāhaving seen
dhārtarāṣṭrānthe sons of Dhritarashtra
kapidhvajaḥhe whose banner bears the emblem of Hanuman
pravṛttebeing about to begin
śastrasaṃpātethe clash of weapons
dhanuḥbow
udyamyahaving taken up
pāṇḍavaḥthe son of Pandu (Arjuna)